कुर्सी(अधिकार)'s image
Poetry1 min read

कुर्सी(अधिकार)

udaykumar030462udaykumar030462 December 3, 2022
Share1 Bookmarks 43 Reads1 Likes

जंगल राज नहीं आतंक राज, बात सिर्फ है कुर्सी का ।

चिन्तन नहीं आज चिन्ता है, प्राप्त करने को कुर्सी का ।

कुर्सी के लिए ही भिन्नता है,चिंतन नहीं आज चिंता है ।

कोई सेकुलर बन कर आया, कोई धर्म का लिया सहारा ।

अपनी डफली अपना राग, चाहे टूटे भाईचारा ।

सोच सोच कर घृणा होता, अधिकांश का दिल है काला ।

अंधकार है, उग्रवाद है, पद पाने का सिर्फ ख्वाब है ।

निस्वार्थ अगर हम हो जाएं तो बन जाएं सब भाई भाई ।

जाति धर्म का भेद मिट जाए, मिट जाए जो बना जुदाई।

एक समय था, मिलजुल कर, गुलामी का जंजीर तोड़, आजाद हुए थे ।

न कोई दिवाल भिन्नता, अपनापन था, अपनी अपनी कुर्बानी दे, वो भारत माँ को आजाद किए थे ।

वह जज्बा आज खत्म हो गई , चाहत सिर्फ है कुर्सी का ।

कर्तव्य में खींच-तीर, अधिकार मिले, लड़ाई सिर्फ है कुर्सी का ।

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts