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फिर तुंम्हीं से दिल लगाया होता

Tushar srivastavaTushar srivastava October 7, 2021
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अगर होता दिल फिर तुम्हीं से दिल लगाया होता

घीसे पत्थरों से फिर वहीं एक मूरत बनाया होता


मैं तो अंधेरे कमरे में क़ैद गुमनाम एक साया था 

एक आहट से भी फिर वहीं दीपक जलाया होता 


मुनासिब कहा अब लौट कर मेरा वापिस आना

काश तुमने लाश को घर अपने दफ़नाया होता 


सुनाती अगर तुम किस्से भी शब-ए-तन्हाई के 

तेरे महफिल में अगली सफ़ बैठा मुझे पाया होता 


बहुत अदब से पूछ रहा तुमसे बेवफाई का सबब

कह दो 'सादिक' तेरे सजदे में सिर झुकाया होता 


जो टूट चुका हो उसे तुम अब की क्या तोड़ोगे

दर्द सह सको तो फिर बिखरे काँच उठाया होता

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