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~श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी, 

हे नाथ नारायण वासुदेवा।~


वो अश्क़ अश्क़ बह रहमैं उदर से उतर रही

वो आते जाते उधर से

जिधर से मैं गुजर रही

वो नब्ज़ नब्ज़ सम्भाल रहमैं संभल संभल के चल रही

वो मन-ए-मकां बना रहे

मैं मनसूबे कुचल रही

हया नही हवा में

जो ओर ओर चल रहे

जरुरतों के मारे वो

दर-ब-दर टहल रहे

वो निशा निशा निरख रहे

मैं दिवा दिवा निखर रही

वो शाम शाम ढल रहे

मैं सुबह सुबह निकल रही

वो अश्क़ अश्क़ बह रहेमैं उदर से उतर रही-

त्रिशला पाठक


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