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वो अनसुलझी पहेलियाँ

Bharti TripathiBharti Tripathi October 2, 2021
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"वो अनसुलझी पहेलियाँ"


स्थिरता में थी

एक विचित्र सी हलचल,

गति में भी अविरत

अवरोध था।

शांत-सा दिख रहा था आक्रोश

और शून्य भी निरंतर

असंख्य हो रहा था।

निःशब्दता कोटिशः बातें

कह रही थी।

कोलाहल भी कोने में

दुबका चुपचाप पड़ा था।

दिन और रात सब

एक जैसे हो गए थे

सब देखकर भी कोई

आँखें बंद कर लेता था

और कोई बिन देखे भी

आभास कर लेता था।

भ्रम भी भ्रमित था

उस भ्रमजाल से,

पहेलियों का जैसे अम्बार था।

समझ से परे था

कि क्या हो रहा है?

आज भी होता है प्रायः वही सब

कभी प्रत्यक्ष तो कभी परोक्ष रूप से

लेकिन वर्षों के अथक प्रयास से

धीरे-धीरे सुलझ रहीं हैं

वो अनसुलझी पहेलियाँ!

    

             -भारती त्रिपाठी






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