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लै मुरली नख शिख़ तक साजो, गात बजावत ग्वालन में ।

कर कोमल ,सलिल, सरोज भलो ,दिन रात फिरत संग गईयन में।

मंजुल अंजुल संग राशि रचो , भ्रुकुटी विलसत बनवारी को

भौहन मटकत नैनन छिपकत कटिबंध बनी अब नागिन सो।

मेरे मोहन विचरत है फिरत ब्रज में है बसत धूरी माटिन में।


जब जन्म लियो लीला करके, लाली चित लाय लगी सबके।

सब तोड़ दियो, नीर मोड़ दियो, डग दृढ़ कियों माया करके।

मामा तारो, अंगना वारो ,अमृत वसुधा पर लाई दियो।

ये बाजी लगे बजना सबके ,यदुनंदन आई गयो चलके।


मैया गैया ग्वालिन सबके ,दूध घी और दही को यो मोल बताओ।

रतिया बतिया करती ब्रजनारी ,यो दूध के झिको को ले उड़ जायो ।

ओरहन सुनि के मैया हसती , मोर लाला गयो होतो गईया चरायो ।

लीला करते पय पीय गयो,मेरे प्रियतम यशोदा के दुलारे ।

रोवत कजरा सब छूट गई जब छोड़ भगो मथुरा के लिए।

नैना तरसे ,बरसे रतिया , मनवा रोवे प्रिय श्याम लिए।

मुरली की तान ,लगे यू ही बान भयी सुनसान नगरी ब्रज की ।

तजी मथुरा को तुम आ जाओ ,अंखियां भूखी दर्शन के लिए ।


 तोयज त्रिपाठी

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