खोखला लोकतंत्र's image
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ख़त्म हुई होश करने की बारी
सत्य होगी अब कवि की वाणी
जल उठी है अब धरती हमारी
गीदड़ो पर पड़ेंगे कुत्ते भारी

वर्षो से मुक्त है मातृभूमि बेचारी
फिर भी चारो तरफ भीषण बेकारी
कहीं भुखमरी,किसी को बीमारी
रोते हुए हर जगह बेबस, गरीब और नारी

आये यहाँ तब से कितने रामराज्य के पुजारी
खुद डूबते हुए गीदड़ की तरह, डूबी दुनिया सारी
जितने बड़े बनाए हवाई किले, घोटाला उतने भारी
समजवाद, लोक कल्याण लगते हैं अब गारी

चुनाव सामने है सोचते नेता और नेतारी
कैसे हो जीतना, मेरी पार्टी कैसे  हारी
वोट की रोटी सेंकने में, किसने किसकी जारी
जिस पार्टी का टिकट मिला, वही पार्टी प्यारी.

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