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मंटो कौन है?

Harsh TiwariHarsh Tiwari May 12, 2022
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मंटो को जानने के लिए सबसे पहले मैंने मंटो से पूछा तुम कौन हो?

जवाब मिला "मैं एक जेबकतरा हूं जो अपनी जेब ख़ुद काटता है, और कोई कहानी मेरी जेब से कूदकर बाहर आ जाती है।"

मंटो का जवाब साधारण नहीं हो सकता क्योंकि सआदत हसन के बाद "मंटो" का पैदा होना ही खुद में एक बड़ी घटना थी। मंटो ही नहीं उनकी कहानियां भी हमारे साथ जिंदा हैं उनके किरदार भी कभी हमारे अंदर कभी आस पास भटकते मिल जाते हैं। उनके अफसाने एक एहसास हैं उनकी बनावट और बेबाकपन भी एक एहसास हैं। मंटो के अफसाने किसी व्याख्या दृष्टि का सहारा नहीं लेती पर विश्लेषण होता है लेकिन अनुभव के द्वारा किसी दैवीय संवेदना की तरह।

जॉन डान ने लिखा है.

उस का विशुद्ध और बोलता सा रक्त उस के कपोलों में बोलता था और इतना स्पष्ट रूप से उत्तेजित था कि यहां तक कहा जा सकता था कि उस का शरीर सोचता था।

मंटो के अफसानों में सुंदरता और क्रूरता एक साथ गूंथ जाती हैं, कभी कभी ये खयाल आता है की उसको मंटो के अफसानों के अलावा कोई नाम नहीं दिया जा सकता। मंटो के अफसानों में सुंदरता और क्रूरता के बाद एक और खास बात है जो शायद मेरी नजर में मंटो को मंटो बनाती है वह है विडंबना ये साधारण विडंबना नहीं है, ये मंटो के विडंबनाओं की दुनिया है। "बाबू गोपीनाथ" में मंटो ने लिखा- "रण्डी का कोठा और पीर का मजार बस ये दो जगह है जहां मेरे मन को शांति मिलती है।.. कौन नहीं जानता रण्डी के कोठे पर मां बाप अपनी औलाद से पेशा कराते हैं और मकबरों और तकियों में इंसान अपने खुदा से। टोबा टेक सिंह को पढ़ते हुए मैं खोजने लगा था की वास्तविक पागल कौन है? टोबा टेक सिंह या हम सब ? ये किसी एक व्यक्ति के पागल होने की नहीं बल्कि पूरी कौम के पागल हो जाने की विडंबना है।

मंटो के बारे में गोपीचंद नारंग ने लिखा है "मंटो अव्वल व आखिर एक बागी था। वह हर शय जिसे DOXA या रूढ़ी कहा जाता है मंटो उन सब का दुश्मन था। मंटो की कहानियों ने मुझे कभी ये नहीं बतलाया की क्या सही है, क्या ग़लत है या क्या होना चाहिए या नहीं होना चाहिए। उनकी कहानियां मुझे मेरे हाल पर

अनगिनत सवालों के साथ झकझोर जाती हैं।

"दुनिया को समझाना नहीं चाहिए, उसको खुद समझना चाहिए।"

आखिर में सलीम अख्तर की बात को कहने में मुझे आज भी गुरेज़ नहीं है की जरूरत है ऐसे सिरफिरे की जो खिड़की खोलने की हिम्मत रखता हो। आज का युग अपना मंटो पैदा करने में असफल रहा है इसलिए न केवल सआदत हसन मंटो की जरूरत आज है, बल्कि पहले से भी अधिक शिद्दत से। काफी पहले मैंने भी कहा था "अगर गीता क़ुरान या बाइबल जैसी धार्मिक पुस्तकों के लिखे जाने के बाद भी प्रेमचंद और मंटो की कहानियां सच्ची लगती हैं तो जला देना चाहिए उन किताबों को शायद उसकी राख मल के दुनिया समझ जाए।"
 
बेढब अघोरी

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