सत्य - असत्य's image
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झूठ हमेशा ही, बेबस मन की लाचारी  होता है।

एक सत्य खुद में ही, सौ झूठों पर भारी होता है।।

लाख छिपाओ सीने में, पर सत्य नहीं छिप पाता है।

देर-सवेर एक दिन सच, परदे  से बाहर  आता है।।

...

नहीं झूठ की खेती, होती फलित समय के साथ कभी।

चार दिनों की हरियाली के बाद, बिखरते पात सभी।।

राह सत्य की कांटों भरी, और पथरीली  होती  है।

एक बार चल पड़े, अन्त में फिर मोती ही मोती है।।

...

एक झूठ को सच करने को, अगणित झूठ बोलते जाते।

नये नये ये झूठ, स्वयं की, खुद ही पोल खोलते जाते।।

होता जब सामना  सत्य से, रिश्तों  का  विश्वास  टूटता।

दोस्त दुश्मनी पर आ जाते, जीवन भर का साथ छूटता।।

...

कितना भी, कैसा भी हो, हर झूठ, झूठ ही कहलाता है।

सच की गरिमा के आगे, यह कहीं भी नहीं टिक पाता है।।

सच्चा हर इंसान, हर जगह, ध्यान, ज्ञान, आदर पाता है।

झूठ बोलने  वाला, हर मंजिल  से, पीछे  रह  जाता  है।।







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