हिसाब - किताब's image
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क्या कुछ गंवाया ज़िन्दगी मे, छूटा है और क्या?

इसका कोई हिसाब है, ना ही किताब हे।।


पर जो दिया है जिन्दगी ने, अन्ततोगत्वा।

उसकी मिसाल ही नहीं, वो लाजवाब है।।


बचपन से ही था शौक कुछ,पढ़ने का,लिखने का।

कविता  में, कहानी  में,  रुचि  बेहिसाब  है।।


मौका दिया न जिन्दगी की, उठापटक ने।

हर मोड़ पर, हर चेहरे ने, पहना नकाब है।।


अब ढल रही सी जिन्दगी की, सांझ के पहर।

ऐसा लगा कि लौट कर, आया शबाब है।।


सपने या शौक जो भी थे, अदृश्य अभी तक।

अब एक एक करके, उतरता हिजाब है।।


कविताएं लिखीं, गीत लिखे, और गजल भी।

पर नाम, न पहचान, न कोई जवाब है।।


मेहनत, लगन, उम्मीद, चाह,ले रही आकार।

आखिर में छपने जा रही, मेरी किताब है।।






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