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छणिकाएं ...(1989 की रचना)

Thakur Yogendra SinghThakur Yogendra Singh October 13, 2022
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नफरत सबसे मिल सकती है, प्यार नहीं मिलता है,

बिना प्यार के कोई भी, अधिकार नहीं मिलता है।

लाख सींचो रात दिन, या खाद में रोपो, मगर,

फूल अपनी डाल पर, मौसम में ही खिलता है।।

...

यूं तो जुदाई में किसी की, कोई मर जाता नहीं,

जिन्दगी ही मौत बन जाए,तो कोई क्या करे।

ये जुदाई की तड़प, वो रूठ कर जाना तेरा,

मैं करूं तो क्या करूं, ये दिल करे तो क्या करे।।

...

सर हमने चढ़ाया है, तो  बोझ  भी  सहेंगे,

किस्मत में जो जलना है, तो क्या गिला किसी से।

जो आग कर ना पाई, वो काम तुम्हीं कर लो,

हमको तो यूं भी दुनियां में, कुछ ना मिला किसी से।।

...

रात  भर, जलता  रहा  ये  तन  बदन,

कहां  गई बरसात, वो ओले  कहां  गए।

सुबह हुई तो, समझ न आया, कुछ भी हमको,

कहां  गई  वो  राख, वो  शोले  कहां  गए।।

...

रात के पहले पहर की, बात मत छेड़ो अभी,

तुम जहां चाहे रहो, चन्दा हमारे पास है।

सपनो को साकार करना,अब तो है मंजिल यही,

वरना अपनी जिन्दगी में, और अब क्या खास है।।





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