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भावनाओं का शहर

Thakur Yogendra SinghThakur Yogendra Singh February 13, 2022
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है धरा की परिधि निश्चित, सिन्धु की सीमित लहर है,

भू की गति के साथ, मौसम का बदलता हर पहर है।

जो न बदली कभी वो, इंसान की अपनी प्रवृत्ति है,

तन है बस्ती श्वास की, मन भावनाओं का शहर है।।

...

यूं तो आने और चले जाने, का प्रक्रम जिन्दगी है,

साथ जिसके कामनाएं, दर्द, बन्धन है, खुशी है।

हर दिवस संघर्ष की, सूरत नई लेकर उभरता,

अगले पल होना है क्या, इसका कोई उत्तर नहीं है।।

...

फिर भी हम एक आस से, विश्वास से,बढ़ते निरंतर,

चाहतों की मनोवृत्ति पर, व्यंजनाओं का कहर है।

जो न बदली कभी वो,इंसान की अपनी प्रवृत्ति है,

तन है बस्ती श्वास की, मन भावनाओं का शहर है।।

...

मन वचन क्रम से हैं संचालित, सहज संवेदनाएं,

किसको छोड़ें,क्या संभालें,किसको भूलें,क्या निभाएं।

बस इन्हीं गलियों में जीवन, भटकता है जिन्दगी भर,

पर न बदलीं हैं, न बदलेंगी, सदा से ये विधाएं।।

...

जिन्दगी अमृत सदृश, हर परिस्थिति अनुकूल हो तो,

पर अगर प्रतिकूल, तो हर श्वास नित धीमा जहर है।

जो न बदली कभी वो, इंसान की अपनी प्रवृत्ति है,

तन है बस्ती श्वास की, मन भावनाओं का शहर है।।



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