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परिपाटियों के साथ चले जा रहे हैं हम।

हर रोज यूं ही खुद से छले जा रहे हैं हम।।

...

जो बीत गया,बात गई, पर अटल रहे।

उनके नसीब से ही, जले जा रहे हैं हम।।

...

नाकामयाबियों के भी, किस्से सुने बहुत।

उन सब का हश्र देख, गले जा रहे हैं हम।।

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अपनों के साथ सपने देखना, खता थी क्या?

क्यों उन्ही सब को आज खले जा रहे हैं हम?

...

ना किसी की पसंद बन सके, न जरूरत।

बस रात-दिन के साथ, पले जा रहे हैं हम।।

...

नीयत है ये नियति की, या अपना गुरूर है।

या इत्तिफाक से ही, टले जा रहे हैं हम ।।

...

बैसाखियों का शौक कभी था, न अभी है।

सपनों की डोर थाम, चले जा रहे हैं हम।।

...

अच्छाई को भी किसी ने, अच्छा नहीं कहा,

फिर किसकी दुआओं से, फले जा रहे हैं हम।।

...

सबकी खुशी के ख्याल में, गम को किया कबूल।

पंखे सी हर उम्मीद, झले जा रहे हैं हम।।

...

अब और कुछ नहीं तो, सिला तो सही मिले।

अब तो इसी आशा में, ढले जा रहे हैं हम।।



 








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