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आज फिर पट खुले झरोखों के,

सर को जैसे किसी ने सहलाया।

नींद आंखों से हो गई ओझल,

मन पे यादों का धुंध सा छाया।।

...

रात बढ़ती रही अंधेरों में,

मन खयालों में डूबकर खोया।

जिस्म बेहोश,बेखबर था मगर,

रुह को रास्ता नजर आया।।

...

वो भी क्या दिन थै कि जब

बेखोफ था, बेपरवाह था बचपन।

न किसी कर्ज की  किचकिच ,

न कोई बोझ, फर्ज का साया।।

...

गांव,चौपाल,खेत,बाग,शहर,

कूल, बम्बा, रहट,तालाब,नहर।

ये ही थै खेल, पर्यटन के स्थल,

शौक जीने का यहीं से आया।।

...

ग्रीष्म,चौमास,शीत के संग संग,

भू का परिवेश बदलता रंग ढंग।

सोंधी मिट्टी की भीनी खुशबू में,

तन सना,मन भी महकता पाया।।

...

पाठशाला  में टाटपट्टी  पर, 

पैर  फैला के बैठने का  हुनर।

दोनों घुटनों पे टिका कर तख्ती,

कलम पकड़ी तभी लिखना आया।।

...

कापियां जब से हाथ में आईं,

लिख के पन्ने, फटे, जहाज बने।

कुछ तो बारिश में नाव बन तेरे,

कुछ ने सपनों को उड़ना सिखलाया।।

...

आज फिर जैसे जी लिया बचपन,

तोड़ दशकों की उम्र का बन्धन।

मन को अद्भुत सा चैन मिला,

रूह ने भी अनूठा सुकूं पाया।।





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