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चाँद की चाँदनी

tarunveer_s_ctarunveer_s_c November 30, 2021
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चाँद की चाँदनी और तारों की रात में,

मैं निकल आया हूँ जुगनुओं की रात में।


बेअदब बेवकूफों जाहिलों की भीड़ ये,

चल रहे उसके पीछे ख़्वाहिशों की रात में।


मैं कहूँ जो ख़ूब है वो, यकता तुम मान लो,

या चाँदनी को देख लो वादियों की रात में।


पंख खोले ख्वाहिशें ओ' अधूरी गुंजाइशें,

अधूरे ख़्वाब भी आ मिले फ़ासलों की रात में।


अमीरों की फ़ौज भी ख़ैरात लेने जा रही,

गुमाँ सब गवाँ बैठे हसरतों की रात में।


गुज़रगाहों पर भटका देर तलक़ रात मैं,

फिर उतर आया मैं जंगलों की रात में।


मक़्तल खुले हैं सरे आम तेरे शहर में,

जाने क्या होगा इन कातिलों की रात में।


नासिर तू भी दिल-शिगाफ़ी समझ अब मेरी,

'बदनाम' कहाँ जाएगा तन्हाइयों की रात में।



-तरुण वीर सिंह


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