मुट्ठी भर आग's image
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आज से नही.... युगों से जलती आई हूं

कभी जौहर किया...कभी सती हुई

आज से नही हमेशा से सहती आई हूं

जन्म का बोध हुआ,तो विवाहित थी

जीना कहा नसीब हुआ,

जिंदगी तो मैने दी

एक,दो नही कई बच्चे...सारे लड़के

गर्वित किया परिवार को, समाज को

खुद हमेशा इसी बोझ तले दबी रही

लड़की को कोख में क्यों नहीं धारण किया मैने?

बचपन कटा,शीश झुका रहा,नजरे चुराती रही

जवानी भी काट गई गुलामी में

और बुढ़ापा कटा,मदद की आस लगाए

सारे बच्चे चले गए,उसी लड़की की खातिर

जिसने मेरे कोख को देखा भी नही

सोचती हूं की काश मैं भी लड़का होती,तो क्या होता?

आज जीते जी सती न होना पड़ता,रोज जिंदगी की भट्ठी में यूं जौहर करने को न कूदना होता!

न बाल विवाह होता,न दासी होती

मैं भी अगर लड़का होती,तो शायद चुल्लू भर पानी नसीब होता,

मुट्ठी भर आग नही!

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