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आँख मिचौली

SwatiSwati December 22, 2021
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ज़िंदगी आँख मिचौली के खेल सी है
कभी सबकी नज़रों से अपनी खुशियां छुपाते हैं 
तो कभी आँखो में आँसू छुपा के खुशियां ढूंढते हैं

यादें अक्सर गुज़रे वक्त के कोनो में छुप जाती है
फुर्सत की घड़ियों में गुज़रा ज़माना ढूंढते है
बचपन की गलियों में जो छुप गए हैं
इस जादुई डिबिया में उन दोस्तों को ढूंढते है 

हर रोज़ आईने के सामने संवरते है
वक्त के थपेड़ों को चेहरे पे छुपाते है
कभी जिससे इतरा के बातें करते थे
आईने में हम अपना वो अक्स ढूंढते हैं 

ज़िंदगी की तेज़ रफ़्तार से डर के कही छुप गए थे हम
वक्त आगे निकल गया, अब हम उसके निशान ढूंढते हैं
कहाँ खो गए हम, कोई तो ढूंढता होगा हमें, 
के सिर्फ हम ही खुद को ढूंढते है ?

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