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मैं सोचूं,
क्या कलम में स्याही की कमी हो गई
या विचारों में शब्दो की।
फिर एहसास हुआ,
कलम से लिखने जाऊ तो ये स्याही उसका ही का नाम लिखती है
और विचारों में उसका ही नाम शब्द बनके ज़ुबा पे खिलता है।
तो फिर कुछ और कैसे लिख पाती,
तो फिर कुछ और कैसे सोच पाती।

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