*प्रेम का अनंत*'s image
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एक निहारिका में बनती किसी आकाशगंगा से

तुम मुझमें आकार ले रहे हो !

अनेक गैसीय पिण्डों यानी तारे सा

तुम्हारा व्यक्तित्व गढ़ रहा है

मेरे हृदय का प्रति एक स्पंदन और

उसमें जगता भावनाओं का ज्वार.....

शिराओं में प्रवाहित होता तप्त लहू संकेत दे रहा है

तुम्हारी निकटता का;

और वह एक क्षण 

जब मेरी अंतस भावनाओं की ऊर्जित तरंगों से

प्रस्फुटित होगा प्रेम,

तो किसी विशाल अस्तित्व से अलग होकर 

हम बन जायेंगे दो अलग सूक्ष्म अस्तित्व,

दो अलग देंह!....

जैसे सूर्य से विलग हो बने पृथ्वी, शुक्र और 

सम्पूर्ण सौर मंडल ......

और फिर जैसे सृष्टि का होता है विस्तार,

हमारे व्यक्तित्व में लय प्रेम प्रसारित होगा ,

अपनी अनंत सीमा तक !.….

फिर हमारी सामान्य संवेदनाएँ होंगी तीव्र ;

और बढ़ेगा हमारे मध्य असाधारण आकर्षण !...

तुम और मैं कम करेंगे व्यास अपनी परिधियों का ;

और फिर एक-दूसरे से मिलन की सभी चेष्टाएँ ,

अंततः हमारे अस्तित्व को कर देंगी एक ......

हमारी ऊर्जाओं से फिर होगा 

एक नए अस्तित्व का प्रादुर्भाव ;

और हम लय हो जाएंगे जीवन के अंतरिक्ष में !....

अपनी अन्यतम् परिणिति के होंगे साक्षी ;

विलीन हो जाएंगे उसी शून्य की कोख में ,

जिसमें पनप रहे हैं अनेक प्रेमी मन ;

असंख्य आकाशगंगाएँ, अशेष निहारिकाएँ!


-स्वरांजलि 'सावन' ❤️

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