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कुछ कहानियाँ लिखी जाती हैं,

दैहिक और मानसिक बोध से परे....

नैसर्गिक सुख के लिए! 

जिनमें आदि, मध्य और अंत का कोई अवकाश नहीं होता, 

जो जीवित रहती हैं पात्रों के चरित्र में 

और सुनाई जाती हैं उनके विलीन हो जाने के बाद भी...

जो विकसती हैं किसी अमलतास पर,

किसी अमर बेल सी!

जिनमें स्पंदित होते हैं असंख्य भाव;

प्रेम के निकट, संबंध से परे मोक्ष नाद!

जो न परिभाषित करती हैं स्थायित्व,

न पर्याय बनती हैं उच्श्रृंखलता का;

जिनमें विरोधाभास नहीं होता मनोविकारों 

और सामाजिक चिंतनों का....

जिनमें नहीं व्यापता भय कुछ पाने या खोने का!

जिनकी प्रत्येक पंक्ति हो जाती है स्वत: 

किसी कालजयी उपन्यास का कथानक;

ऐसी कहानियाँ मुक्त हो जाती हैं 

संवाद के क्षुद्र बंधनों से!

किन्तु फिर भी स्वर देती हैं ,

अनंत मौन भाषिक वृत्तियों को;

इन्हीं असंख्य, अनभिज्ञ, अव्यक्त, 

अलिखित कहानियों में से एक...

ज्ञात कहानी का शीर्षक और कथानक 

लिखने का प्रयास कर रही हूँ मैं!

मैं और तुम उस कहानी के केंद्रीय पात्र हैं!!.....

-स्वरांजलि 'सावन'

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