मन's image
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कभी कभी तो सागर सा मन, 
विस्तृत अविरल बहता जाऊँ,
कभी कभी बस गागर सा मन,
मौन सरस भरता जाऊँ,
शिथिल कभी , कभी उत्साहित,
चिंतित , हर्षित, पुलकित या द्रवित,
गर्वित भी हो तो किसपे हो,
क्यों गूढ़ कथा कहता जाऊँ?
अस्तांचल में ताप लिए, 
बाहर से शीतल हो प्रतीत,
वर्तमान में जीते हम,
कैसे भूलें अपना अतीत....

.....शुक्लाजी की कलम से

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