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दु:ख होता है , जब चीख दबानी पड़ती है

मन की अंतर ज्वाला से , अश्रु छुपानी पड़ती है

मैं क्या हूं ???

का संघर्ष अनवरत जारी जब तक रहता है,

निष्कामकता का पाठ , तभी तक याद वही तक रहता है,

उस बेचारे ने जो कि इतनी मेहनत से बागवानी थी,

सींचा था स्वेदों से, भावनाओं से की रखवाली थी

ऐसे में फलों का कड़वा स्वाद उसे अखरता है

धूप- छांव- बारिश का मौसम याद कर सिहरता है

ना तब , ना अब कोई सा भी अंतर आया है।

दु:ख होता है, जब अंतर से अंतर् की बात छिपानी पड़ती है

जब चीख दबानी पड़ती है, अश्रु छिपानी पड़ती है।


✍️श्रुति अलंकार

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