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तुम बहुत खूबसूरत लगती हो

जब करती हो सादगी का श्रृंगार,

जब लेती हो स्थिरप्रग्य अवतार ,

और फिर जब बना लेती हो श्रुतियों को अलंकार

सच में ,

तुम बहुत खूबसूरत लगती हो

ये लगना कितना अज़ब है

और होना कितना गजब है

कभी कभार या ज़ार बार ,

जब करती हो असत्य का तिरस्कार

सच .....

दे जाती हो भावनाएं हजार

और फिर वो भावनाएं कर जाती हैं ,

मेरे गलतियों में सुधार ,

अनगिनत बार

असंख्य ,अदम्य, अतुल्यनीय,

बढ़ जाती है शोभा,

तुम्हारे श्रृंगारों की

तुम तब स्वयं से भी अद्भुत लगती हो

शायद कुछ भी नहीं तुम ,

पर मेरी गिनती की

शून्य भी तुम ,

अनंत भी तुम लगती हो

और फिर एक नई परिभाषा गढ़ती हो

कि तुम बहुत ही खूसूरत लगती हो।


- श्रुति "अलंकार "

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