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आंखों में धुआं है यादों का
अब वजह तू है फसादों का

दिन मेरे दीन हो चुके हैं अब
वक़्त चल रहा है नशादों का

फिर दोहराऊं ऐसी गलती है तू
पर क्या फ़ायदा इन मुरादों का

नसीबों से मिलती है मुहब्बत
मुहब्बत तो पेशा है बर्बादों का

कोई और मिले भी तो क्या!
शीरीं ही अरमान है फरहादों का

आखरी सांस तलक चाहेंगे उसे
और काम क्या है हम-फरहादों का?

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