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फिर कभी....

हसीं शाम की सुनहरी किरणों के साए में

गंगा के किनारे बैठ कर

शांत बहती हुई धाराओं को देखते हुए

पूरे दिन की थकान आपकी बातों में लपेट देंगे।


फिर कभी....

किसी हसीन इतवार की सवेरे जब सूरज ने पलकें खोली होंगी

हरे-भरे खेतों के बीच,तन के खड़े पहाड़ों के पीछे

बिखरे पत्थरों के बीच साथ बैठ सुनहरे पलों को जी लेंगे।


फिर कभी....

किसी पूनम की क्षणदा में

चमकते सितारों और हसीं शशि को गवाह बनाकर

अपनी गलतियों और बेहिचक बातों के जालों में

खूबसूरत सवेरे को आपके नयनों से देख लेंगे।


फिर कभी...

बरखा की हल्की बूंदों में छोटी छोटी सी चाहतों के साथ

बेकाबू कशिश में आपसे फिर बेपनाह इश्क कर लेंगे।


फिर कभी...

आपकी हसीं यादों की राहों से गुजरते हुए

हकीकत की जम्हूरियत को पूछते हुए

मचलते इस मन को समझाते हुए

जेठ की तपती दोपहरी में

मासूम से आपके चेहरे पर

खूबसूरत सी हंसी ला देंगे।

फिर कभी.....

_______सुहानी राय

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