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        प्रिये !



मैं मूक सहमा सा प्राणी

तुम तानों की बौछार प्रिये,

तुम सर्वदा बनी दरोग़ा

मैं अपराधी हर बार प्रिये !


तुम सूरज की प्रखर किरण सी

मैं चंद्र सा मध्यम प्रिये,

तुम निकलती जब भोर उजाले

हो जाता मैं ओझल प्रिये !


मैं ठहरा सागर का तीर

तुम लहरों की हलचल प्रिये,

जब भी बनाऊँ मैं ठौर रेत का

तुम करती उसे समतल प्रिये !



मैं सावन की रिमझिम बरखा

तुम बे मौसम सूनामी प्रिये,

मैं पूँछ तुम्हें करता हर कारज

तुम करती मनमानी प्रिये !



मैं साधारण जन मानस सा

तुम घर की सरकार प्रिये,

तुम लगाती अनुच्छेद नए नित

मैं शोषित लाचार प्रिये !

           -सुधीर बडोला

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