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प्रिये-॥


मैं ठहरा अनुगत नर स्वामी

तुम भार्या हुक्मरान प्रिये,

क्षण भर में प्रकट होता मैं

सुन तेरा फ़रमान प्रिये ।


मैं ठहरा कंठ काग का

तुम कोयल की तान प्रिये,

मधुर वाणी से जब तुम पुकारती

क्यूँ हो जाता मैं हैरान प्रिये ।


तुम महलों की उड़ती तितली 

मैं लघु कुटिया का भँवरा प्रिये,

चार कोनो में सिमट रह जाओगी

कैसे रखूँ सिर अपने सेहरा प्रिये !


मैं मंत्रों का उच्चारण

तुम उनकी व्याख्यान प्रिये

मैं तपस्वी विश्वामित्र सा

तुम मेनका का व्यवधान प्रिये ।


दफ़्तर मेरा सिक्का चलता

तुम ठहरी अपवाद प्रिये

घर आकर जब रौब आज़माया

 मिला भोजन बे-स्वाद प्रिये ।


-सुधीर बडोला

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