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नयी राह


जिसका कोई स्वरूप ना था

मन के अनुरूप ना था

द्वेष छल से भरे था

सत्य से परे था

ईमान रोज़ मारता

दर्पण भी धिक्कारता

आज मैं संभल लिया

वो रास्ता बदल दिया

नयी राह पर चल दिया


-सुधीर बडोला

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