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   लड़की हुई है


गर्दन झुकी थी

बिना नज़रें मिलाये

दबे दबे स्वर में बोला

फिर 'लड़की' हुई है

उम्मीदों पे गिरी बिजली

और माहौल को मायूसी ने घेरा

आज ख़ुशियों की आहट ने

मानो फिर एक बार मुँह फेरा

सोचा सिलसिला ये ना जाने

कब तक चलेगा

'चिराग़' इस घर में

कभी तो जलेगा

झल्लाहट में सभी ने

किया 'नवजात 'को अनदेखा

दोष 'वारिस' ना देने का

फिर घर की लक्ष्मी पर फेंका

जिस पल की प्रतीक्षा में

प्रसव की पीड़ा को जननी ने सहा

सर्जन की सुखद अनुभूति से

आज मातृत्व भी वंचित रहा

बहिष्कृत इस वेदना को कब तक

इन नन्ही परियों को सहना है

कब तक निरीह इन नैनों से

बे-वजह अस्कों ने बहना है

ना जाने संसार में कब

ये प्रगतिशील परिवर्तन आयेगा

जब 'कन्या' जन्म के साथ साथ

हर घर में सौभाग्य भी आयेगा ॥

        - सुधीर बडोला

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