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        जिरह अच्छी नहीं

 

क्या हुआ अगर

तुम मेरे विचारों से सहमत नहीं

हर बात पर जिरह अच्छी नहीं


तुम अपने तथ्य रखो

मैं उन्हें ध्यान से सुनूँगा

सम्मान के साथ

थोड़ा मतभेद भी रखूँगा

मेरा और तुम्हारा व्यक्तित्व अलग है

विचार भी भिन्न हो सकते हैं

विश्लेषण की क्षमता

साथ तर्क भी अलग हो सकते हैं

क्यूँकि तुम तुम हो ,मैं नहीं

हर बात पर जिरह अच्छी नहीं



बात वाद विवाद की है

क्यूँ इतने उत्तेजित होते हो

ना रहा भाषा की मर्यादा का ज्ञान

साथ संयम भी खोते हो

अपने अभिप्राय रखने से पहले

तुम क्यूँ अनायास मुझे टोकते हो

स्वरों को ऊँचा कर अपने

मुझ पर जबरन भाव अपने थोपते हो

शायद तुम अपनी मै अपनी जगह सही

हर बात पर जिरह अच्छी नहीं    

                                     

                 - सुधीर बडोला

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