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आबरू


बेरहम नर-पिचासों की हवस की बलि चढ़ी थी

ज़िंदा तो थी वो बे-आबरु मगर लाश सी पड़ी थी

भीड़ जुटी जमघट बढ़ा फिर भी ना कोई आया

हाथ बढ़ा ना कोई आगे, तरस सभी ने खाया

टुकड़े टुकड़े वस्त्र तन पे तार- तार सी काया

धज्जी -धज्जी लज्जा मौत का दबा दबा सा साया

डर से कांपती सड़कों पर असुरी मनोवृत्ति वाले शैतानो से

कब ये पावन धरा मुक्त होगी ऐसे नर-भक्षी हैवानों से ।।

यातनायें वेदनायें किस हद तक इन्हें सहना है

दीवारों में चुनवा के भी कब तक ख़ामोश रहना है

हर चीख हर आँसू कब तक अपना दर्द बयाँ करेगी

कब तलक डर के साये में मासूमियत घुट- घुट के मरेगी

दम तोड़ती सभ्यता ने नारी की रज़ामंदी का ना सोचा

दरिंदों के हाथों ने तो कभी नज़रों ने उनके ज़िस्म को नोंचा

करे मातृ कोख़ को लांछित ऐसे चरित्रहीन इंसानों से है

कब ये पावन धरा मुक्त होगी ऐसे नर-भक्षी हैवानों से ।।

 

                                      सुधीर बडोला

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