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आज पहली बार किसी शख़्स के दीदार को तरसे हम।

sudhansuranjan945sudhansuranjan945 March 7, 2022
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आज पहली बार किसी शख़्स के दीदार को तरसे हम।

खफा रहते हैं जो मिलने अपने रूठे यार को तरसे हम।।


बहुत दिन से निकला हूं अपने घर से, मंजिल तलाशते।

आज फिर गली, मोहल्ले अपने घर-बार को तरसे हम।।


यूँ बे-असर हुई तुझसे मिलने की हर मुमकिन कोशिशें।

वक़्त ने करवटें ऐसे बदली की तेरे इंतेजार को तरसे हम।।


इस बार सोचा कुछ कर गुज़रूँ तेरी खातिर इस जहां में।

कटी नहीं हांथों कि नशें बस चाकू के धार को तरसे हम।।


मैं अक्सर समेटता रहा नाज़ुक रिश्तें कोमल दोस्ती को।

बदलते वक़्त में रिश्तें और दोस्ती के प्यार को तरसे हम।।

- सुधांशु




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