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ओ शराबी।

तुम शराब लाख पी लो।

चाहे दारू के ठेके को तुम अपने जननी समझ लो।

धिक्कार तुम्हें तुम्हारी मोहब्बत पर।

जो तुम्हें इतनी दूर तक घसीट कर लाई है।

क्या तुम्हारे अंदर के स्वाभिमान ओ को।

क्या तुमने बेच खाया है।

शिकस्त खा कर इस तरह गिरे हो।

लगता है तुम मर मिटे हो।

एक औरत से पूछ लो आकर।

प्यार किसी और से करके।

किसी और के लिए मुस्कुराती है।

अपनी पलकों के आंसू नीचे नहीं गिरने देती।

अपनी आंखों के नीचे दबाती है।

जुल्फों के साहरे छुपाती है।

जीवन में एक बार जरूर किसी ना किसी से दिल लगाती हैं।

यही सोचती हुई।

हर रोज मृत सैया पर लेट जाती है।

सुबह होते ही फिर मुस्कुराती है।

हर गम भूल कर।

अपने दर्द छुपा कर बड़े आसानी से मुस्कुराती है।

कायर तो ना बनो तुम।

इन दारू के ठेको पर रखा क्या है।

बासी बसाई हस्ती मिटा दे।

इतना छालता है यह।

सब कुछ लूट कर भी।

अकेले हंसता है यह।

ओ शराबी ।

ओ शराबी ना पीओ तुम।

तुम्हारे दिल और दिमाग दोनों को छलता है।

यह रंग और रूप बदलता है ।

इसका कोई ईमान नहीं।

यह बेईमान के पास ही बिकता है।






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