किताबों पर हम मोहब्बतें दास्तां ए लिख रहे थे।'s image
Poetry2 min read

किताबों पर हम मोहब्बतें दास्तां ए लिख रहे थे।

Sudha KushwahaSudha Kushwaha October 10, 2021
Share0 Bookmarks 152 Reads2 Likes

किताबों पर हम मोहब्बतें ए दास्तां लिख रहे थे।

उधड़े पन्ने जो हमारे दिलों की दास्तां कह रहे थे।

सनी धूल से जो किताबें थी।

उसमें रखा था एक खत

जो मिला हमें।

हम मोहब्बतें दास्तान उनकी अब पढ़ रहे थे।

4 साल पुराने उन यादों में उस शख्स को ढूंढ रहे थे।

हम सोचने लगे थे कि आखिर वह कौन थे।

खत में जो नंबर था।

हम अपने फोन में लिखी ही रहे थे।

कैसे बताएं।

उन्होंने कहा तब तक वह नया आशिक बना चुके थे।

हमें वह वैसे भी पसंद नहीं थे।

हम तो जानते ही नहीं थे।

जो सपने हमारे साथ देखने के लिए सोचे थे।

वह किसी और के साथ निभा चुके थे।

किताबों पर हम मोहब्बतें ए दास्तां लिख रहे थे।

उधड़े पन्ने हमारे दिलों की दास्तां कह रहे थे।

रूहे हमसे कुछ और कह रही थी।

दिल से हम कुछ और कह रहे थे।

मर्दों की इस नालायक से दुनिया में।

कोई लायक मर्द हम ढूंढ रहे थे।

मुकम्मल उस मोहब्बत को हम डायरी के पन्नों पर हर रोज कैद कर रहे थे।

कैसे कहें अब हम वह नहीं रह गए थे।

पन्ने उधर रहे थे।

किताबे समय की मार से बूढ़ी हो रही थी।

जिस्म इंतजार कर रही था।

रूहे थक रही थी।

दो कौड़ी के प्यार से वह दूर हट रही थी।

जब मन करता था तो अपनी रूह से मिलने।

लाइब्रेरी में पड़ी उन पुरानी किताबों में के तेरे खतों को पढ़ लिया करती थी।

फिर वह समझ गई थी।

मोहब्बत वह सिर्फ रूहो की थी।

जिस्मो ने तो कब का साथ छोड़ दिया।

ऊन पन्नों की तरह थे हम।

यादों में कैद रहे सारी उम्र हम।

उन खातों की तरह जिंदा थे उनके दिल में हम।

पर वह जिस्म बेच आए थे।

शर्म नहीं आती उन्हें।

हमें मोहब्बतें ए दास्तां बताने आए थे।












No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts