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इन हवाओं में कुछ अपनापन है।

Sudha KushwahaSudha Kushwaha November 3, 2021
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इन हवाओं में कुछ अपनापन है।

सुना पड़ा जो मन है।

मेरे घर के आंगन में एक चहल पहल है।

गुजरती जो गलियां है।

उस पर मेरे बचपन की सुनहरी चादर है।

पड़ोस वाली आंटी के घर में जिंदा आज भी मेरे बचपन की चाहत है।

इन हवाओं में कुछ अपनापन है।

उसके नीचे बैठा जो मेरा तन है।

दुपट्टे से ढाका जो मेरा अंग है।

मन में मेरे एक अलग उमंग है।

जीवन में कुछ ना होकर भी एक तरंग है।

बचपन के वो दिन कितने अच्छे थे।

आज उन सुनी गलियों को बचपन का इंतजार है।

इन हवाओं में कुछ अपनापन है।

गलियों की छाप के ऊपर छपा मेरा बचपन है।

यह जो अपनी गलियों के नुक्कड़ है।

कभी उस के बादशाह रह चुके थे हम।

बचपन भी कितने हसीन हुआ करते थे।

यारी खूब निभाते थे हम।

बिना बात के भी लड़ जाते थे हम।

इतना हौसला था कि।

कबड्डी भी जीत जाते थे हम।

जब अगली टीम हारती थी खूब मुस्कुराते थे हम।

उस खुशी को जीने के लिए बचपन की उन कल की गलियों पर गुजारना पड़ेगा।

उन हसीन लम्हों को।

पलकों पर जिंदा रखने के लिए।

आंखों से बहुत कुछ कहना पड़ेगा।








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