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एक सिपाही की अपनी ख्वाहिश ।

Sudha KushwahaSudha Kushwaha November 3, 2021
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काश मौत भी ऐसी आती कि सारा जमाना याद करें।

किसी के आंखों से आंसुओं की बारिश ना होती।

गमों की कोई बरसात ना आती।

मरते वक्त भी मेरे कंधे पर बंदूक और मेरे सर पर टोपी होती।

सीना इतना फौलादी होता।

तिरंगा सरहदों पर गाड़ कर आंखों में एक गजब की चमक होती।

सीने पर मेरे लगी हो गोली चाहे रक्त से रंगीन जमीन होती।

ओ घर में बैठकर स्टेटस लगाने वालों।

तुम्हें क्या पता वह मौत कितनी हसीन होती।

बस मूछों पर एक ताओ होठों पर हंसी होती।

वह जिंदगी भी क्या जिंदगी होती।

काश मौत भी ऐसी आती कि सारा जमाना याद करें।

अपने न रोते कभी हमारी जुदाई में।

जब याद करते सिर्फ हंसते।

दूसरों को हंसाते कुछ कर जाते।

पापा का वह प्यार अम्मा की वह प्यारी लोरी मेरे शाहिद होने पर कौन सुनाएगा।

गर्व होता मेरे उस हसीन मौत पर मेरे अपनों को।

क्या मजाल दुश्मनों की हमारे जिंदा होने पर भी सरहद पार कर सके।

जब तक सांस है इन सीने में।

तब तक सीना तान के खड़े हैं हम।

जज्बा इतना हम मे की अमीरों की अमीरी भी बड़े हैं हम।

जज्बात को अपने सीने में दबाए खड़े हम।

अपनी हीर को घर पर छोड़ कर।

सरहद पर खड़े हम।

काश मौत भी ऐसी आती कि सारा जमाना याद करें।

हम चले जाते किसी की आंखों से आंसुओं की बरसात ना आती।

मेरी इतनी सी ख्वाहिश मेरी मां जिंदगी भर मुस्कुराती।

जब भी उसे दर्द होता मेरे बीते लम्हो के किस्से सुनाती।

वह मेरी मां है।

वह मुझे जब भी याद करती मेरे बर्थडे पर एक केक किसी गरीब को खिलाती ।

मुझे व्हाट्सएप पर ना लगाकर वह।

एक गरीब के साथ मुस्कुराती।

एक मासूम को फिर धरती मां का लाल बनाती है।

वह भी अपना सीना ताने सरहद पर खड़ा हो पाता।

मेरी तरह ही वह कुछ कर जाने का जज्बा रख पाता।

मेरी हीर का सहारा।

और तुम्हारी मुस्कान बन पाता।







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