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छोड़कर जो इतरा रहे हो।

Sudha KushwahaSudha Kushwaha March 28, 2022
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छोड़कर जो इतरा रहे हो।

होले होले से मोहब्बत के किस्से सुना रहे हो।

जो अपनी अकड़ में मगरूर।

फिर क्यों जलन के मारे दिल को जला रहे हो।

अपने जज्बातों को क्यों दफना रहे हो।

अपनी ही बेवफाई के किस्से सुना रहे हो।

खूब इतरा रहे हो।

अपने ही जख्मों पर मुस्कुरा रहे हो।

टूटी सी चारपाई पर बैठ कर।

आसमानों की तारे अपने पड़ोसी को गिनाआ रहे हो।

छोड़कर जो इतना इतरा रहे हो।

खुद को बर्बाद कर लिया।

तारीफ करनी पड़ेगी तुम्हारी।

फिर भी अकड़ से मुस्कुरा रहे हो।

डर के मारे घबरा रहे हो।

पड़ोसी तक से अपनी फीलिंग को बड़े प्यार से छुपा रहे हो।

कमबख्त वह अपने हुस्न का दीदार कर खुद ही हुस्न हुस्न चिल्ला रहे हैं।

सारी रात करवटें बदलते हुए बिता रहे हैं।

हाय मेरे बेवफा आशिक अपने गमों में भी मुस्कुरा रहे हैं।

सहूलियत सीख ली उन्होंने।

इसीलिए बैठे-बैठे ही चारपाई चबा रहे हैं।

मोहब्बत की यादों में अपनी ही उंगली दबा रहे हैं।

छोड़कर जो इधर आ रहे हैं।

तस्वीर देखकर घमंडी कहीं के दिन बिता रहे हैं।

लाखों मरते हो दिल पर।

पर सुकून नहीं है।

घमंडी है तो क्या हुआ।

पर इस दिल को यकीन नहीं है।



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