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अब जान नहीं जिस्म में।

Sudha KushwahaSudha Kushwaha March 21, 2022
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अब जान नहीं जिस्म में।

रुहो ने भी जवाब दे दिया।

कब तक वह तुझ से अपनी बेज्जती कर आएगा।

उसने तुमसे कह दिया।

पर दिल को एक बार फिर तुझ पर भरोसा हुआ।

सब कुछ हार कर भी मुझको।

फिर एक बार धोखा हुआ।

सपनों के रंगीन चादर के पीछे।

तेरे लबों की एक हंसी।

झकझोर गई मुझे।

अब जान नहीं जिस्म में।

रूहों ने जवाब दे दिया।

कब तक तेरे गंदे चेहरे को वह दुनिया से छुपाए गी।

अरे इतना हार गई है अब।

कि अब वह जीतना ना चाहेगी।

घर को तूने।

दारु की दुकान बना दी ।

हर रिश्ता ऐसा कुचला की।

तूने सड़क पर ही श्मशान बना दी।

आसपास से भी कोई अब अपना नहीं गुजरता है।

तेरी गलियों से अब जमाना भी डरता है।

पर मैं क्यों ठहरी हूं ।

यह सवाल उठता है।

मेरे दिल में हर दफा एक बार दर्द होता है।

सवालों की उलझन में इतनी उलझी हो।

कि सवाल सामने होने के बावजूद भी मोह के मारे ना दिखता है।

हृदय डरता है।

दिमाग कुछ और कहता है।

पर सहनशक्ति कहती है कुछ दिन और ।

कुछ दिन और।

बदल जाएगा ।सुधर जाएगा।

पर आगे क्या होगा यह सवाल उठता है।

रोहो ने जवाब दे दिया है।

जिसके पास वक्त नहीं है।

लाठी का बोझ बहुत सहा है उसमें।

रीड की हड्डी टूट गई।

पर फिर भी जीने की आस है।

ममता की है मूरत ओ ।

यही बस एक आखरी आस है।

बाकी मर चुके उसके जज्बात है।

उसके मन के अंदर एक घाट है।

जिसका नाम श्मशान घाट है।

जहां हर रोज के विश्वास की एक चिता जलती है।

उसके मन में नहीं बची कोई आखिरी आस है।

झूठा ही सही पर को जज़्बात है।


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