लफ्जो के किनारे's image
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लफ्जों के किनारें ... by me

बेनाम खंडहर से मकानों में बसा हैं 
ये कौन हैं जो ऐसे ठिकानों में बसा हैं 

परिंदा बस जाए तो संवर जाए
वो गुलमोहर जो मन के बागानों में बसा हैं 

वो अक्सर कुछ सोच कर रो पड़ता हैं
क्या किस्सा हैं जो वक्त के कानों में बसा हैं 

पलके साथ नहीं देती बातो को तेरी
तू आज भी मेरे बहानो बसा हैं 

वो चरागों से दूर अकेला हंस रहा हैं
कितना दर्द आज उसके पैमानों में बसा हैं 

चीख उठता हूँ मैं कुछ बोलना चांहू
बेसाज शख्स मेरे तरानों में बसा हैं 

बादल बनकर आ और बहा ले मुझे
मेरा प्यार तेरे दिल के ढलानों में बसा हैं

निखर उठती हैं रूह जिसके नूर से
वो मोती तो इश्क के खदानों में बसा हैं 

वो जिंदा हैं और जिंदा ही रहेगा
जो शख्स बुजुर्गो की जबानों में बसा हैं

बदनाम हूँ में जाओ पूछ लो उनसे
सुभाष आजकल "यारो" के तानो में बसा हैं 

by me
--सुभाष यारो फ़िलहाल
#स्वरचित
#ग़ज़ल_जैसी
#Poetry

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