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सचमुच अजीब होते है सपने कविता

sube singhsube singh December 23, 2021
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कितना अचकचा जाता हूँ मैं 
जब वह सुनाती है अपने सपने 
अजीब सब कुछ देखती है वह 
नींद की नदी में नहाते हुए 

उसके सपनों से अधिक ख़ौफ़नाक होता है 
उसका सपना सुनना 
इतना हँसते हुए इतना ख़ुश 
कोई कैसे कह सकता है उन सपनों की बाबत 
जिनके पाँव के निशान जीवन में 
अभी कहीं नहीं हैं 

वह कहती है उसने 
आँगन में बँधी गाय देखी श्यामा 
बच्चियाँ दूध पीती हुई गुनगुना ताज़ा 
हँसते हुए मैंने पूछा दूध कितना था पानी में 
वह ग़ुस्सा हो गई 
उसने मुझे देखा मूँछों सहित 
हँसते हैं महीने के अंतिम दिन 
मुसीबत में फँसे अपने दोस्त को 

सौ-सौ के कुछ नोट देते हुए 
मैं भय की जकड़ में कसा गया उसी वक़्त 
कहा महज़ इतना 
बक़वास है यह सन्निपात जैसी 
ऐसे दिनों में मूछों को पहनना 
कितना फूहड़पन है 
सौ-सौ के नोट देखना सपने में 
कितनी घटिया बात महिने के अंतिम दिन 
सकपकाई नहीं वह हँसी कहते हुए 
मैंने भी पहनी थी उसी दिन नई साड़ी 
हम गए थे नाव के मकान से होते हुए 
पहाड़ के पास 
अपने ही नहीं आस-पास के भी 
चमकते हुए शांत वैभव में 
तुमने सुनाई थी वहाँ एक कविता 

इतनी ख़ुशी देख उसकी 
हिंसक होना मुझे नहीं भाया 
नाटक किया थोड़ा-सा मैंने भी 
अपनी बेचैनी को छिपा कहा 
ऐसे सपने सुनाते नहीं कभी 
क्योंकि वे झूठे हो जाते हैं कहते ही 

सचमुच अजीब होते हैं उसके सपने 
फटी आँखों से देखते हुए स्याह वक़्त को 
अनमना-सा सुनता हूँ 
देह पर काँटे महसूसते हुए 
एकांत में सोच उसके सपनों का सनीमा 
हँस पाता हूँ मैं भी कत्थई हँसी 
किंतु उसके जैसा कहाँ?


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