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वो 7 दिसम्बर की ही सुबह थी जब आख्रिरी बार मिले थे "हम-तुम"….क्योंकि रात तुमने एक नयी शुरुआत करनी थी किसी अजनबी के साथ....

आखिरी बार मेरे सीने से लग जाना चाहती थीं तुम, पर न जाने क्यों तुम्हारी बात मानने वाला मैं, चाह कर भी तुम्हारी इस ख्वाहिश को पूरा न कर सका, हर बार मेरे लबों पर अपनी नर्म उँगलियाँ फेरती थीं तुम पर जाने, जाते-जाते क्यों मेरे लबों से लब मिला गयीं तुम....

मुझसे हमेशा मुस्कुराने का वादा ले, अपने सारे वादे भूल, मुझसे दूर जा रहीं थीं तुम, मुझे ये दुआ देकर की सदा खुश रहना तुम...

पर सुनो, तुम्हारी ये दुआ कभी काम न आयी मेरे, हाँ तुमको तो सदा मुस्कुराता ही देखता हूँ मैं, क्योंकि मैंने दिल से मांगी थी दुआ तुम्हारे लिए, आंसुओं से नहीं.....

अपनी सहेली से मेरा हालचाल न पूछा करो तुम, कब तक झूठ बोल पायेगी वो, तुम खुश रहो, मुस्कुराती रहो और मुझे बस यूँ ही याद आती रहो, मेरे लिए यही सुकुन है...!

आज का दिन मुबारक हो तुम्हें.....

सौरभ शर्मा

(नई दिल्ली)

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