"  यादें  "'s image
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कितनी भोली 
होती है यादें
पता नही कब कैसे 
उठ जाती है धीरे से 
मन के किसी एक कोने से 

और 
फिर पसरने लगती है 
जैसे    पसरता है 
       नीर सागर का 
गौते लगाता है मन 
उस गहरे सागर में 
जिसमें समाहित है
अनगिनत नदियां 
  तुम्हारी यादों की

निहारते  है  नैन 
उस अथाह सागर को 
औऱ बहने लगती है 
नैनो से नदियां 
तुम्हारी याद में
जिन्हें खींच लेता है 
सागर
फिर अपनी गोद में
और ऐसे ही पसरता जाता है
यादों का ये सागर .......
    #``शिवेश~

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