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कौन सुलाएगा मुझे!

Dr. Shruti SoveDr. Shruti Sove August 6, 2022
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कौन सुलाएगा मुझे!
यह रात का चाँद तो सुनता है मुझे,
मुझे मुझ से ही जोड़ता है,
कभी मुझे मुझ से ही बचाता आया है,
नींद में भी नींद रहती नहीं मुझे।
कभी आँख खुली तो कभी आँख बंद है,
मगर कुछ है जो खाता है अंदर ही अंदर बरसो से...।
आँख बंद करना बस सीख लिया हो जैसे मैंने।
चित्त की ऊर्जा खाती है तन-मन को मेरे,
मन में दबी एक अजीब सी आवाज़ है,
सोने देता नहीं जो मुझे एक पल भी।
मैं शांत प्रतीत होती हूँ मगर मुझ में मची उतल-पुथल का बरसो से चल रहा भवंडर है।

जब परिस्तितियाँ  विपरीत रहती है, जब जीना एक बोझ सा लग रहा होता है, नींद है जो मृत्युशय्या बन जाती है।
कुछ पल के लिए ही सही तर देती है जीवन को विपत्तियों से।
ज़िंदा होकर भी मोक्ष का एहसास करा दे वो कुछ पल ककी नींद चाहिए मुझे ...
मगर ये रात भी बीत चुकी अब कौन सुलाएगा मुझे!

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