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भावनाओं से,उलझना है कब तक।
भावनाओं से,लड़ना है कब तक।।

मेघ-मल्हारो वाली बरखा जब,सजती है।
तब ओ है हमे खुद से ही,कहती है।।

ओ खुद को खुद से ही,समझाती है।
खुद से ही यू बार-बार,इठलाती है।।

हम भी भावनाओं को,जब समझ न पाते।            तब ओ हमसे कुछ कहे,हम नकार न पाते।।

लेकिन भावनाओं में भी,है तेज़ उत्कृष्ठ।
ओ भला न समझें,है नही उसकी प्रवृत्ति।।

भावनाएं हैं तो है भावों का, एक संगम।
मन-भावनाओं की तुलना में है मन, अति चंचल।।

                                               (शिवम वेद मिश्र)


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