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वक्त की देहरी पर उम्र की दोपहर को शाम किया है..
अपना आज तुम्हारे कल के लिए बलिदान किया हैं..
ना कोई शिकायत की कभी, ना कोई गिला किया हैं..
मंथन से निकला अमृत दिया तुम्हे, खुद तो सदा विषपान किया हैं..
कभी जताया नहीं उन्होंने, ना कभी इस ऋण का कोई अभिमान किया हैं।

- शिप्रा

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