जर्जर मन's image
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कभी कभी मन की स्थिति भी जर्जर हो जाती है,
ठिक वर्षों पुराने मकान की तरह, जिसमें कहीं पोतई की परत दर परत गिर रही होती है तो कहीं खिड़की उम्र दराज हो जाने के कारण मकान से बाहर झांक रही होती है,
कभी कभी तो दरवाजे भी उम्र के दरवाजे को खटखटा कर मन में प्रवेश कर रहे होते हैं
मन के इस जर्जर हालत को कैसे ठिक करें, कहां से सुधार की प्रक्रिया प्रारंभ करें, ये समझ पाना आसान नहीं होता।

कई बार इस हालात को ठिक करने के लिए मैं कविता या मन की स्थिति को लिख लिया करती हूं, ये मन को मरम्मत करने समान है, वाकई लिख कर एक सुखद अनुभव भी मिलती है और विश्राम मिलता है मन को।

© शिल्पा शैली { स्वरचित पंक्तियां}

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