अँगीठी's image
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कार्तिक की शीतल रात्रि में जब ,

देह में इक सिहरन–सी होती है,

कांपते हुए बशर को मिलती है जब,

खुले फूटपाथ के नीचे धुएं से भरी अँगीठी,


पूरे हिम्मत से मारता है फूंक वो बेघर ,

और, निकाल फेंकता है,

सारे संचित विकार उस अँगीठी पर,

धधक उठती है वो धुएं वाली अँगीठी,

खिलखिला उठता है वो बेघर,

और, सोचता है– काश!

जिंदगी यही ठहर जाती।।


– शशि

{ चित्र साभार – इंटरनेट}









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