जुस्तजू's image
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आग जुस्तजू की सीने में लगाते रहे 
सुबह उठ कर के शामें गंवाते रहे 

खुदा कर गया कायनात मेरे नाम पर 
फिर भी हम ज़िंदगी भर कमाते रहे 

दर्द जब उठा तो उठता ही चला गया 
क्यूं घाव को नासूर हम बनाते रहे 

ख़राब हालों में फूल तो मुनासिब न हुए
चंद कांटे ही थे जो रिश्ता निभाते रहे। 

विकाश शर्मा 

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