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बिगड़ रही हूँ मैं...

shailja2527shailja2527 May 26, 2022
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कुछ सीखा रहा है वक़्त मुझे हर घड़ी,न जाने कौन से इम्तेहान को तैयार कर रहा है मुझे हर घड़ी।

कल जो थी,आज जो भी हूँ और कल जो हो जाऊंगी,

पल पल हर पल कुछ बदल रही हूँ,

इस सब्र की आग में तप के निखर रही हूँ हर घड़ी।

बस अब और ना आंको मुझे,किसी दायरे में ना बांधो मुझे,

अब वो रात गुज़र गयी है,ये दिन का उजाला फैला है,रौशन कर रहा है मुझे हर घड़ी।

सादी सी साड़ी मे लाये थे तुम जिसे,हाँ उसे तुमने ही तो सिखाया है थोड़ा बदल के चलना, यूँ अकड़ के चलना,

पहन के नया ज़माना अब so called बिगड़ रही हूँ हर घड़ी....

पर खुल रही हूँ हर घड़ी,उड़ रही हूँ हर घड़ी..खुद से मिल रही हूँ हर घड़ी।

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