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खुद ही भटके हैं हुए राह दिखाने वाले,
सो रहे आज हैं लोगों को जगाने वाले। 

यूं भी नफरत का है अंज़ाम बुरा होता,
बारहा खुद भी जले हैं आग लगाने वाले।

तू पिला ज़ाम उसी नाज़ अदा से साक़ी,
हैं बहुत लोग अभी नाज़ उठाने वाले।

कद्र मयखाने की तेरे न हुई कम साक़ी,
अब भी आते हैं इधर ग़म को भुलाने वाले।

हौसला हार न इक ख़्वाब बिखर जाने से,
जीतते ही हैं नये ख़्वाब सजाने वाले।

"शैल" हालात बदलते हैं सभी के इक दिन,
बस रहें दूर ही एहसान जताने वाले।

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