वहम's image
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तुम्हारी नामौजूदगी को क्या मैं समझूं

ये झूठ का वहम कहा तक लेके घूमूं 

शायद ही ऐसा कोई मोड़ होगा जहां से

मैं पलट के पीछे तेरे होने का वहम ना पालूं

शायद ही ऐसी कोई बरसात हुई होगी 

जिसमे तेरे साथ भीगने का वहम ना पालूं

अब तेरी यादों अंकुर हुए बीज भी 

तेरी फ़ासलों के धूप से डरने लगे है 

मेरे ख्वाबों के सारे महल विरान पड़े है

मेरे मन में मंदिर तो है मग़र मूरत नही

'लानत' हर रोज मेरा दरवाजा

 खटखटाने चला आता है

हर रोज मैं उसको भगा देता हू

ये कहकर कि 

ऊपर देर है मग़र अंधेर नही ,

अगर अंधेर है भी तो चौफेर नही,

'सब्र' से हर रोज़ दो-दो हाथ होती रहती है मेरी

तुम कहो तो मैं एक बार हार के देख लूं

'उम्मीद' हर रोज मेरी बाहों में दम तोड़ना चाहती है

तुम कहो तो एक बार उसे भी मैं टूटने दूं

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